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Orgo-Life the new way to the future Advertising by Adpathwayलोग अक्सर मुझे इस्लामी आख्यानशास्त्र अर्थात माइथोलॉजी पर लिखने की चुनौती देते हैं। लेकिन वे यह नहीं जानते कि विकिपीडिया पर ‘इस्लामी आख्यानशास्त्र/ माइथोलॉजी’ नामक लेख पहले से ही है। और यूनिवर्सिटियों में लोग उतनी ही सहजता से इस्लामी, ईसाई और यहूदी आख्यानशास्त्र/ माइथोलॉजी की बात करते हैं जितनी की वे यूनानी, मिस्र के और नोर्स आख्यानशास्त्र/ माइथोलॉजी की बात करते हैं। यह ‘चुनौती’ 19वीं सदी की परिभाषाओं पर आधारित है, जिनके अनुसार आख्यान मिथ्या है और धर्म तथा विज्ञान सत्य है, न कि 21वीं सदी की परिभाषाओं पर, जिनके अनुसार आख्यान लोगों का सांस्कृतिक सत्य है जो प्रमाणों के प्रति तटस्थ है।
हां, 19वीं सदी में हिंदू धर्म को अपने बहुदेववादी विचारों के लिए मिथ्या मानकर उसका तिरस्कार किया गया, जबकि केवल एकेश्वरवादी विचारों को धर्म माना गया। इस प्रकार, हिंदू धर्म को यूनानी विचारों के साथ वर्गीकृत किया गया। उल्लेखनीय बात यह है कि विभिन्न एकेश्वरवादी विचारों में से केवल ईसाई विचारों को धर्म का दर्जा दिया गया। यूरोपीयों और अमरीकियों ने यहूदी विचारों को ‘ओल्ड टेस्टामेंट’ मानकर उसे पुराना माना। दूसरी ओर, उन्होंने इस्लामी विचारों को भी धर्म नहीं माना क्योंकि वह ब्रह्मचर्य को महत्त्व नहीं देता था।
आजकल, अक्सर प्रयोग किया जाने वाला वाक्यांश, ‘यहूदी-ईसाई’ आख्यानशास्त्र/ माइथोलॉजी, इस बात की स्वीकृति है कि दोनों की जड़ें एक हैं। दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान जर्मनी के नाज़ी लोगों (इसकी बिल्कुल बात नहीं की जाती कि वे ईसाई थे) ने यहूदियों का विध्वंस करके होलोकास्ट किया। इसके बावजूद, ईसाई चर्च इस घोर कृत्य पर चुप रहा। इस चुप्पी से स्तब्ध होकर यूरोप और अमरीका ने यहूदियों से क्षमा मांगने और उन्हें मनाने के प्रयत्न किए। इस वाक्यांश का पहला प्रयोग तब हुआ। और ‘अब्राहमी’ यह विशेषण आख्यानों के लिए केवल बीस साल पहले, ग़ल्फ़ युद्ध के बाद होने लगा।
20वीं सदी के अंत तक, जब भी कोई यहूदी धर्म, ईसाई धर्म और इस्लाम की एक जड़ की बात कर यह दिखाने का प्रयास करता कि वे मेसोपोटामिया, फ़ारस और मिस्र के आख्यान शास्त्रों के साथ जुड़ें थे तो कोलाहल मच जाता था। लेकिन अब ऐसा नहीं है। आधुनिक विश्व विज्ञान को महत्त्व देता है और उसमें यह मान्यता है कि हर धर्म आख्यानों के माध्यम से एक विश्वदृष्टि निर्माण करता है। ईसाई धर्म और इस्लाम भी ऐसे ही धर्म हैं।
21वीं सदी में सभी आस्तिकता को आख्यान माना जाता है, क्योंकि हम परमात्मा की धारणा का मापन नहीं कर सकते हैं। यदि परमात्मा आख्यान हैं तो पैग़ंबर भी आख्यान हैं। यहाँ अत्यंत महत्त्वपूर्ण बात यह है कि आख्यान का अर्थ मिथ्या नहीं है। आख्यान एक सामूहिक कथा है जिसके आधार पर लोग सहयोग करते हैं। जैसे हिंदू आख्यानशास्त्र/ माइथोलॉजी हिंदू समुदाय को जन्म देता है वैसे इस्लामी आख्यानशास्त्र/ माइथोलॉजी इस्लामी समुदाय को जन्म देता है। धर्मनिरपेक्ष आख्याशास्त्र/ माइथोलॉजी धर्मनिरपेक्ष समुदायों को जन्म देते हैं। इस प्रकार, समुदायों के निर्माण में आख्यानशास्त्रों की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। वे समुदायों को बंधे रखते हैं। भारतीय होकर भी यह आश्चर्यजनक है कि हम इस्लाम के बारे में इतना कम जानते हैं। यह इसके बावजूद कि विश्व के सबसे प्राचीन मस्जिदों में से एक केरल में है।
ऐसा क्यों? हम रामायण और महाभारत के बारे में बहुत कुछ जानते हैं। मिशनरी स्कूलों और टेन कमांडमेंट्स तथा पैशन ऑफ़ द क्राइस्ट जैसी हॉलीवुड फ़िल्मों के कारण हम बाइबल की कथाओं से भी परिचित हैं।
लेकिन इस्लामी आख्यानों का क्या? 1992 में दूरदर्शन ने बाइबल की कहानियों पर धारावाहिक बनाया था। लेकिन कुछ समूहों ने उसका विरोध किया और सरकार ने उसका प्रसारण रोक दिया। भारतवासियों को इस्लाम के साथ परिचित कराने का मौक़ा खो दिया गया।
इस्लाम के अतिनैतिक रूप में संगीत और नृत्य वर्जित हैं। फिर भी, देशभर की फ़िल्मों में मुसलमान संगीतकार, नर्तक और अभिनेता काम करते हैं। 15वीं और 18वीं सदियों के बीच तुर्की के ऑटोमन, फ़ारस के सफ़विद और भारत के मुग़ल साम्राज्यों ने इस्लामी कला को बढ़ावा देकर कुरान और हदीथ की कहानियों के चित्रण को भी अनुमति दी। यह इस्लाम का उदार रूप है।
बहुत कम भारतीय 17वीं सदी में बंगाली भाषा में रचित नबी-वंश अर्थात नबियों की कहानियों के बारे में या उसी सदी में तमिल भाषा में पैग़ंबर के जीवन पर रचित चिर पुराणम के बारे में जानते हैं। इन कहानियों से परिचित होने पर हम 1400 वर्ष पहले भारत आए एक अलग विश्वदृष्टि के बारे में जानेंगे — एक ऐसी विश्वदृष्टि जो पुनर्जन्म पर नहीं बल्कि एक जन्म पर आधारित है, जहां अल्लाह के पैग़ंबर मनुष्यों को जीने का सही तरीक़ा समझाते हैं और जहां केवल श्रद्धालू और न्याय का पालन करने वाले जन्नत जा सकते हैं।
हिंदू और इस्लामी आख्यानशास्त्रों में कई समानताएं हैं। दोनों में संपत्ति को लेकर आपस में लड़ने वाले भाइयों का उल्लेख है। हिंदू आख्यानशास्त्र में देव और असुर, नाग और गरुड़, वाली और सुग्रीव तथा पांडव और कौरव के बीच लड़ाई का उल्लेख है। इस्लामी आख्यानशास्त्र में क़ाबिल और हाबिल, इसाक और इस्माइल, तथा याकूब और इसो इन भाइयों के बीच लड़ाई का उल्लेख है। विरासत को लेकर इन लड़ाइयों से हमें याद दिलाया जाता है कि संस्कृतियों और धर्मों के बीच भेद के बावजूद, हम हमारी मानवता से जुड़ें हैं।






















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