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Orgo-Life the new way to the future Advertising by Adpathwayक्या श्रद्धा ही भारत के पतन का कारण है? आइए, आज के लेख में इस विचार पर ग़ौर करते हैं।
हम हमेशा से भारत को एक महान देश मानते आए हैं। हमारे महाकाव्य, साहित्य, कला और अन्य सफलताओं से यह बात स्पष्ट है। हमारे विश्वविद्यालयों में विश्वभर से छात्र पढ़ने आते थे। हम एक अत्यंत समृद्ध देश, जिस कारण विश्वभर में भारत ‘सोने की चिड़िया’ इस नाम से जाना जाता था। लेकिन भारत ग़ुलाम बन गया। हमारा धन हमसे छीना गया और हम ग़रीब बन गए। लेकिन हम ग़रीब क्यों बनें? केवल इसलिए कि किसी बाहरी ताक़त ने हमपर शासन कर हमारा धन लूट लिया या क्या इसका कोई और कारण भी है। वास्तव में भारत विज्ञान के कारण पीछे पड़ा है।
यहाँ ज्ञान और विज्ञान में अंतर समझना आवश्यक है। ज्ञान की जड़ें श्रद्धा में हैं। एक जिज्ञासू व्यक्ति श्रद्धा से गुरु के शरण में जाकर, गुरु की बात पर बिना कोई शंका किए, अर्थात संपूर्ण विश्वास किए उसे ज्ञान के रूप में स्वीकारता है। इसके विपरीत, शंका करना विज्ञान का आधारस्तंभ है। विज्ञान में किसी व्यक्ति का शब्द प्रमान स्वीकारा नहीं जाता है। केवल अवलोकन पर विश्वास किया जाता है।
विज्ञान में अनुमान प्रस्तुत कर उनकी जांच के लिए प्रयोग किए जाते हैं। मापन करना इन प्रयोगों का एक महाहत्त्वपूर्ण अंग होता है। फिर मापन का विश्लेषण कर निष्कर्ष निकलता है। यह प्रक्रिया लगातार करने पर यदि वही निष्कर्ष निकलता है, तो फिर वह निष्कर्ष थ्योरी बनता है। इस प्रकार, किसी भी अनुमान को ठोस प्रमाण के बिना, केवल शब्द प्रमाण के आधार पर स्वीकारा नहीं जाता है।
दिलचस्प बात यह है कि लगभग 15वीं सदी में भारत में गुरु गीता को लिखित रूप दिया गया। उसमें गुरु को परमात्मा के साथ जोड़ा गया। गुरु मंत्र में कहा जाता है कि गुरु अपने माता-पिता, पूर्वजों यहाँ तक कि देवताओं से भी श्रेष्ठ होते हैं। इसलिए, गुरु के शब्द को हम बिना किसी शंका के स्वीकारते हैं।
अब भारत के इस स्वभाव की तुलना यूरोप में स्वभाव से करते हैं। 17वीं शताब्दी में विज्ञान और वैज्ञानिक सोच को बढ़ावा देने के लिए इंग्लैंड में रॉयल सोसाइटी स्थापित की गई। उसका सिद्धांत नूलिउस इन वेरबा था, एक लैटिन वाक्यांश जिसका अर्थ ‘शब्द प्रमाण को न स्वीकारें’ है। इस प्रकार, भारत के विपरीत उन्होंने शब्द प्रमाण को स्पष्ट रूप से नकारते हुए मापन, प्रयोग और प्रमाण का मार्ग चुना।
इसके कुछ समय बाद, यूरोप के अन्य देशों में भी रॉयल सोसाइटी जैसे संस्थान स्थापित किए गए। वैज्ञानिक सोच की व्यापकता के कारण उन देशों ने बड़ी तेज़ी से औद्योगिक विकास किया। इस विकास ने इंग्लैंड में औद्योगिक क्रांति का रूप लिया। धीरे-धीरे यह क्रांति अन्य यूरोपीय देशों तक भी फैली।
इस क्रांति के बल पर इन देशों विश्वभर में उपनिवेश स्थापित किए। अधिकाँश भारत में अंग्रेज़ों का शासन था, जबकि कुछ छोटे हिस्सों में अलग-अलग समय पर पुर्तगाल, फ़्रांस, डेनमार्क और नेदरलैंड ने शासन किया।
इन औपनिवेशिक शक्तियों का भारत पर गहरा प्रभाव हुआ। टेक्सटाइल उद्योग का ही उदाहरण लेते हैं। अंग्रेज़ों के आने से पहले, विश्वभर में बनें टेक्सटाइल का एक-चौथाई हिस्सा भारत था। लेकिन ब्रिटैन में औद्योगिक क्रांति के बाद वहाँ बड़ी मात्रा में टेक्सटाइल मिल खड़े किए गए, जो अधिक कुशलता से और कम दाम में कपड़े बुनने लगें। इन मिलों को कच्चा माल भारत से जाने लगा। इस प्रकार, भारत कपड़ों का निर्यात करने से लेकर केवल कच्चे माल का निर्यात करने तक सीमित रह गया।
इस संदर्भ में उपनिवेश की ओर हमारी प्रतिक्रिया के बारे में चिंतन करना आवश्यक है। हमपर अंग्रेज़ों ने अवश्य 200 साल शासन किया, जिस कारण हम ग़रीब हुए। लेकिन अंग्रेज़ों को दोष देने के बजाय हमें यह स्वीकार करना होगा कि हम ही गुरु के शब्द प्रमान से संतुष्ट रहकर पीछे पड़ गए। दूसरी ओर, अंग्रेज़ विज्ञान के बल पर तरक़्क़ी करते गए।
आजकल राजनीतिज्ञ श्रद्धा को बहुत महत्त्व देते हैं। वे ऐसे लोगों को एंटी-नेशनल तक कहने से झिझकते नहीं हैं जो उनपर शंका करते हैं। लेकिन हमें याद रखना होगा कि देश को जोड़ने के लिए भले ही श्रद्धा आवश्यक हो, देश के विकास के लिए हमें वैज्ञानिक सोच को बढ़ावा देते रहना होगा। हम शंका नहीं करेंगे तो विकास नहीं होगा और हम बस गुरु के चरणों में पड़े रहेंगे।























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